हमारे घर में मौजूद 9 जहर (9 Poisons Present in Our House)

Poisons

हमारे घर में कुछ जहर हैं जिनका सेवन करके हम कई तरह की बीमारियों का शिकार हो रहें हैं । जब तक हम इन जहरों को घर से बाहर नहीं करेंगें तब तक सिर्फ दवा खाकर स्वस्थ रहने की इच्छा करना व्यर्थ है क्योंकि सिर्फ दवा खाने से यदि रोग दूर होते तो आज दुनिया में एक भी व्यक्ति रोगी नहीं होता।

1- आयोडीन युक्त नमक

आयोडीन हमारे शरीर के लिए एक जरूरी तत्व है किन्तु यदि इसकी मात्रा शरीर में अधिक हो जाये तो कई प्रकार के रोग आ जाते हैं जैसे उच्च रक्तचाप, थॉयरॉइड, नपुंसकता या बांझपन आदि । इसके अलावा बाजार में मिल रहे आयोडीन युक्त पैकेट वाले नमक में अलग से और भी कुछ केमिकल डाले जाते हैं जिससे नमक में अलग से डाला गया आयोडीन सुरक्षित रहे और नमक में नमी ना लगे । ये केमिकल जब नमक के माध्यम से शरीर में जाते हैं तो दमा, टीवी, मधुमेह जैसे घातक रोगों का कारण बनते हैं । भारत मे वर्ष के 365 दिन सूर्य प्रकाश(धूप) रहता है जिससे भारत में उतपन्न होने वाले हर अनाज, फल, सब्जी आदि में भरपूर आयोडीन होता है । इसलिए भारत के लोगों को अलग से आयोडीन युक्त नमक खाने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

दुनिया में 60 से ज्यादा देश हैं जहां कई कई वर्षों पूर्व ही आयोडीन युक्त नमक पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लग चुका है । इसलिए बिना आयोडीन युक्त नमक ही खाने के लिए ठीक है । हमारे देश में उपवास के समय जिस नमक का सेवन किया जाता है जिसे हम सेंधा नमक या लाहौरी नमक के नाम से जानते हैं वो खाने के लिए सबसे उत्तम होता है । इस नमक में 84 प्रकार के शरीर के उपयोगी तत्व होते हैं । काला नमक का सेवन भी अच्छा होता है ।

2- रिफाइन और फिल्टर किया हुआ तेल

आयुर्वेद के अनुसार हमारे देश की जलवायु में उतपन्न होने वाली जो तिलहन की फसलें हैं सिर्फ उनका तेल ही खाने योग्य है जैसे तिल, सरसो(राई), मूंगफली, नारियल, अलसी, करडी आदि । इसके अलावा आज हम विभिन्न ब्रांडों के नाम से अन्य जितने प्रकार के तेलों का सेवन कर रहें हैं वो हमारे स्वस्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं क्योंकि इन तेलों का पाचन होने के लिए जो तापमान चाहिये वह मनुष्य शरीर में नहीं हैं जैसे पामतेल, सोयाबीन तेल, सूरजमुखी का तेल, कपासिये का तेल, राइस ब्रान ऑइल, डालडा, ऑलिव ऑयल आदि । पाम तेल हमारे देश में पैदा नहीं होता यह मलेशिया के जंगलों में पैदा होता है , वहाँ के लोग खुद इसे नहीं खाते वो इस तेल का स्तेमाल मशीनों में करते हैं । इसलिए इन तेलों का सेवन कभी ना करे, ऊपर बताये गए तेलों में से किसी का भी सेवन करें । इन तेलों में भी रिफाइन और फिल्टर किया हुआ तेल कभी स्तेमाल ना करें क्योंकि तेल को रिफाइन और फिल्टर करने के लिए 13 से 14 प्रकार के केमिकलों का स्तेमाल होता है ।

आज बाजार में जितने भी प्रकार के तेल उपलब्ध है सभी रिफाइन और फिल्टर तेल हैं । बिना रिफाइन और फिल्टर किये गए तेल में एक तत्त्व होता है जिसे HDL कहते हैं । यह हमारे शरीर के लिए बहुत ही जरुरी होता है परंतु जब तेल को रिफाइन और फिल्टर कर दिया जाता है तो ये तत्व उसमें से नष्ट हो जाता है और उसकी जगह LDL और VLDL आ जाता है जो संधिवात, डायबिटीज, हृदय रोग, लकवा, ब्लडप्रेशर, ब्रेन हैमरेज, थॉयरॉइड, मोटापा और अन्य अनेकों बीमारियों का कारण बनता है । जब से इन तेलों का स्तेमाल बढ़ा है तबसे बीमारियां भी काफी बढ़ी हैं । इसलिए हमेशा बिना रिफाइन और फिल्टर किया हुआ यानि घानी से निकाला हुआ तेल ही स्तेमाल करें और स्वस्थ रहें ।

3- चीनी

चीनी को सफेद जहर कहा जाता है । चीनी और देशी गुड़ दोनों ही गन्ने के रस से बनते हैं किंतु रंग और स्वाद में दोनों बिल्कुल अलग हैं । क्या आपने कभी सोचा कि गुड़ का रंग लाल या काला होता है तो चीनी का रंग बिल्कुल सफेद कैसे ? वास्तव में चीनी को बनाते समय सल्फर, गन्धक, कास्टिक सोडा और इसके ही जैसे अन्य कई प्रकार के हानिकारक रसायनों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण चीनी का रंग बिल्कुल सफेद हो जाता है । किंतु जब हम चीनी का सेवन करते हैं तो यही रसायन शरीर में जाकर मधुमेह, उच्चरक्तचाप, हृदय रोग, संधिवात, लकवा, ब्रेनहेम्रेज, कैंसर तथा अन्य कई प्रकार के घातक रोगों का कारण बनते हैं । इतना ही नहीं चीनी हमारे पाचन तंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है । जो लोग चीनी या उससे बनी वस्तुओं का सेवन करते हैं उनका भोजन ठीक से पाचन नहीं होता ।

इसके विपरीत यदि भोजन के बाद थोड़ी मात्रा में देशी गुड़ का सेवन किया जाये तो गुड़ में फॉस्फोरस की अधिकता के कारण भोजन का पाचन अच्छी तरह हो जाता है । इसलिए चीनी का सेवन पूरी तरह बंद कर दें, इसके स्थान पर लाल या काले देशी गुड़, मिश्री/खड़ी शक्कर(पत्थर के जैसी दिखने वाली) का उपयोग करें ।

4- अल्युमिनियम और नानस्टिक बर्तन

अल्युमिनियम एक जहरीली धातु है । नानस्टिक बर्तन भी अल्युमिनियम के ही बने होते हैं ऊपर से उसपर काले रंग की परत चढ़ाई जाती है जो टेफलॉन नामक एक खतरनाक रसायन की होती है । इसलिए इन धातुओं से बने बर्तनों का उपयोग कभी भी ना करें । सन 1853 में अंग्रेजों ने प्रथम बार हमारे देश में अल्युमिनियम के बर्तनों का प्रयोग भारत की जेलों में प्रारंभ किया ताकि जेल के सभी क्रांतिकारी कैदियों को बीमार बनाके मारा जा सके । ज्यादातर प्रेशर कुकर अल्युमिनियम के ही बने होते हैं । वैसे प्रेशर कुकर अन्य किसी भी धातु या मिट्टी का ही क्यों ना बना हो पूरी तरह बंद होने के कारण आयुर्वेद के नियमानुसार वह हानिकारक होता है इसलिए किसी भी धातु के प्रेशर कुकर का स्तेमाल ना करें । शरीर में अल्युमिनियम की मात्रा ज्यादा होने से दमा, टीवी, थॉयरॉइड, संधिवात, हृदय रोग और मधुमेह जैसी घातक बीमारियां होती हैं ।

इसके स्थान पर मिट्टी, कांसा, पीतल या लोहे के बर्तनों का उपयोग भोजन पकाने के लिए करें । अल्युमिनियम के बर्तन या प्रेशर कुकर में भोजन पकाने से उसके अंदर के 87% से 93% तक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं सिर्फ 7% से 13% पोषक तत्व ही शेष बचते हैं जबकि मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से 100%, कांसे के बर्तन में भोजन पकाने से 97% और पीतल के बर्तन में भोजन पकाने से 93% पोषक तत्व भोजन में सुरक्षित रहते हैं । स्टील के बर्तनों का प्रयोग भी भोजन पकाने के लिए ना करें, थाली ग्लास के रुप में कर सकते हैं ।

5- मैदा/पतला आटा

मैदे या पतले आटे का सेवन हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होता है क्योंकि इस आटे को बनाते समय अधिक पतला करने के लिए मशीनों पर अधिक दबाव देना पड़ता है । जिससे यह आटा बनते समय ना सिर्फ बहुत अधिक गर्म हो जाता है साथ ही साथ इसके अंदर मौजूद शरीर के उपयोग के लगभग सभी पोषक तत्व और फाइबर तत्व भी पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं । इसलिए हमेशा मोटे आटे का ही स्तेमाल करें । आटे को बिना छाने ही स्तेमाल करना चाहिए या मोटी छन्नी से छानकर स्तेमाल करें । पैकेट वाले आटे का उपयोग कभी भी ना करें । चक्की से बनवाया हुआ आटा ज्यादा उत्तम है । कोशिश करें कि गेंहू का आटा 15 दिन और ज्वार, बाजरा, जौ आदि का आटा 7 दिन से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए । बाजार में मैदे से बनी हुई जितनी भी चीजें हैं उनका प्रयोग भी पूरी तरह बंद कर दें जैसे बिस्किट, ब्रेड, पावरोटी, डबलरोटी, खारी, टोस्ट, नूडल्स आदि आदि ।

6- जर्सी गाय, भैंस और पैकेट का दूध

आज पूरे विश्व में भारतीय नस्ल की गायों की मांग है । ब्राजील जैसे देशों में तो भारतीय नस्ल की गायों की संख्या लाखों में है । दुनिया के अन्य देश भी भारत और ब्राजील से गायें ले जाकर अपने देश में भारतीय नस्ल की गायों की संख्या तेजी से बढ़ा रहे हैं । क्योंकि आधुनिक विज्ञान ने भी अब यह मान लिया है कि सिर्फ भारतीय नस्ल की गायों का दूध ही पीने योग्य है जिसे वैज्ञानिकों ने “A2 मिल्क” नाम दिया है । इसके अतिरिक्त जितने भी अन्य दूध हैं जैसे भैंस का दूध या जर्सी गाय(विदेशी गाय) का दूध उनके सेवन से मोटापा, मधुमेह, हृदयरोग, गठिया, पागलपन, नपुंसकता या बांझपन ऐसे अन्य अनेकों प्रकार के रोग होते हैं । इस प्रकार के दूध को वैज्ञानिकों ने “A1 मिल्क” नाम दिया है जो बिल्कुल पीने योग्य नहीं है । यह दूध शरीर में जाने के बाद पाचन नहीं होता क्योंकि इस दूध को शरीर में पाचन होने के लिए 40℃(104°F) का तापमान चाहिए जो मनुष्य शरीर में 37℃ से ज्यादा नहीं है । न्यूजीलैंड के लेखक Keith Woodford ने तो अपनी पुस्तक Devil in the Milk में अनेकों प्रमाण देकर इसे सफेद जहर कहा है । आज पूरी दुनिया में A2 मिल्क की भारी मांग है लेकिन दुर्भाग्य से भारत के लोग भैंस और जर्सी गाय का A1 मिल्क पी रहे हैं और उससे बने घी, दही, मख्खन आदि चीजें खाकर विभिन्न रोगों में फंस रहे हैं ।

7- चाय/कॉफी

चाय/कॉफी आज हर व्यक्ति के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गयी है । लोगो को सुबह उठते ही चाय चाहिए, कुछ लोग तो पूरे दिन में 15 से 20 बार तक चाय पी जाते हैं । चाय के नुकसान भी बहुत हैं लेकिन ज्यादातर लोग इससे अनजान हैं । दुनियाभर के डाक्टरों ने खोजपूर्ण तथ्यों के साथ चाय-कॉफी को भंयकर “विष” माना है । इसमें एक नहीं दस से भी ज्यादा विष हैं जो स्वास्थ्य का नाश करते हैं जैसे स्ट्रिक्नायल, टेनिन, थीन, कैफिन, वोलेटाइल ओयल, कारबोलिक, पेमीन, एरोमैलिक ओयल, साइनोजेन, आक्जेलिक एसिड, निकोटिन आदि । चाय या कॉफी के सेवन से उच्चरक्तचाप, दमा, टीवी, लकवा, हृदय रोग, मधुमेह, ब्रेनहेम्रेज, मिर्गी, सन्धिवात, बुढ़ापा, कैंसर तथा पाचन सम्बंधी अनेक रोग होते हैं । चाय वास्तव में एक औषधि है किन्तु सिर्फ उन लोगों के लिए जिनका रक्तचाप कम रहता है या दुनिया के उन देशों के लोगों के लिए जहां की जलवायु बहुत ठंडी है । भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश के लिए चाय-कॉफी जहर है ।

बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो चाय के नुकसान के बारे में जानते भी हैं और चाय छोड़ना भी चाहते हैं। लेकिन चाय की आदत और तलब की वजह से छोड़ नहीं पाते । यदि आप चाय छोड़ना चाहते हैं तो चाय की जगह चाय के जैसा ही कुछ और पीजिये , ऐसा करके आप आसानी से चाय/कॉफी छोड़ सकते हैं ।

आयुर्वेद में बहुत सारी ऐसी औषधियां हैं जिनका स्तेमाल हम घर में मसालों के रूप में करते हैं , उनको आपस में मिलाकर आसानी से चाय का मसाला तैयार किया जा सकता है । नीचे चाय मसाला तैयार करने और चाय बनाने की विधि बताई गयी है आप इसे घर पर ही तैयार कर सकते हैं । इस आयुर्वेदिक चाय को पीने से ना सिर्फ आप चाय के नुकसान से बच सकते हैं बल्कि कई प्रकार के रोगों से भी बच या मुक्त हो सकते हैं ।

सामग्री:-
-दालचीनी, अर्जुन छाल, पलाश के फूल, तुलसी के पत्ते, सभी 8-8 चम्मच
-सोंठ, सौंफ, अज्वाइन, तेजपत्ता, मुलेठी सभी 3-3 चम्मच
-कालीमिरी, लवंग, इलायची, छोटी पीपल, जायफल, सभी 1-1 चम्मच

सभी सामग्री के पावडर को आपस में मिलाकर कांच के जार में भरकर रख दें । चाय बनाते समय चायपत्ती के स्थान पर स्वादानुसार इस मसाले का उपयोग करें । दिन में 1 से 2 बार इसका सेवन कर सकते हैं । छोटे बच्चों को भी थोड़ी मात्रा में प्रतिदिन इसका सेवन अवश्य करायें । यदि तुलसी का पेड़ घर में है तो तुलसी पावडर की जगह चाय बनाते समय उसके ताजे पत्ते स्तेमाल करें । चाय में चीनी की जगह मिश्री(खड़ी शक्कर) या देशी गुड़ का स्तेमाल करें । गुड़ स्तेमाल करने पर चाय में दूध ना डालें ।

नोट:- दालचीनी और अर्जुन छाल को छोड़कर यदि अन्य कोई सामग्री उपलब्ध ना हो या जिसका स्वाद अथवा गंध पसन्द ना हो तो बिना उस सामग्री को डाले भी यह मसाला तैयार करके स्तेमाल किया जा सकता है ।

8- पिजर्वेटिव मिलाई हुई सभी खाद्य सामग्री

बाजार में अपना सामान बेचने के लिए आज मनुष्य किसी भी हद तक नीचे जाने को तैयार है । वो किसी भी खाद्य पदार्थ को स्वादिष्ट, आकर्षक और खराब होने से बचाने के लिए उसमें कुछ भी मिला सकता है भले ही खाने वाले के स्वास्थ्य को उसका कितना ही नुकसान क्यों ना हो । दुख की बात तो ये है कि सरकार ने ऐसे लोगों को इस प्रकार की बहुत सी चीजें इन खाद्य पदार्थों में डालने की खुली छूट दे रखी है । ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि इन जहरों से हम खुद को तथा अपने घर परिवार और बच्चों को कैसे बचाएं ? तो इनसे बचने का मात्र एक ही ऊपाय है की बाजार में मिलने वाली हर पैक खाद्य सामग्री जिसमें नमी है, जो गीली है या लिक्विड रूप में है अर्थात जिसमें पानी की थोड़ी सी भी मात्रा है उसे कभी उपयोग ना करें । जैसे अचार, चटनी, सॉस, जूस, हेल्थ ड्रिंक, कोल्ड्रिंक, टुथपेस्ट, दूध, दही, बटर, क्रीम, जेल, शैम्पू, तेल तथा अन्य नमी युक्त अनेकों चीजें । इस प्रकार की चीजों में पिजरवेटिव या अन्य किसी न किसी रूप में कोई ना कोई रसायन मिला हुआ होता है ताकि ये चीजें काफी समय तक खराब ना हों । सभी प्रकार के पिजरवेटिव स्वास्थ्य के हानिकारक हैं जो आज छोटी मोटी बीमारियों से लेकर कैंसर जैसे घातक रोगों का मुख्य कारण बन रहे हैं ।

9- सभी प्रकार के मांसाहार

मरे हुए जानवर अर्थात मुर्दे खाने वाले मांसाहारी लोग इसे ध्यान से पढ़ें । दुनिया के बहुत से देश विशेषरूप से यूरोप के देश जिनका मुख्य भोजन मांसाहार ही है उस यूरोप के लोग अब शाकाहार की तरफ तेजी से मुड़ रहे हैं । इसके पीछे मुख्य कारण आधुनिक विज्ञान द्वारा पिछले कुछ वर्षों में हुई खोजें हैं जिसके अनुसार मांसाहारी लोगों में किसी भी रोग के होने की संभावना शाकाहारी व्यक्ति की अपेक्षा कई गुना ज्यादा होती है । सिर्फ इतना ही नहीं मांसाहार के कारण प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन भी तेजी से बिगड़ रहा है ।

आइंस्टीन ने अपनी EPW Theory (आइंस्टीन पेन वेव थ्योरी), जिसमें उन्होंने दर्द की तरंगों के बारे में बताया था की कैसे जानवरों की क्रूरतापूर्वक हत्या करने से प्रकृति क्रुद्ध होती है । बाद में इस शोध को भारत के तीन वैज्ञानिकों  ने आगे बढ़ाया जिसे उनके नाम पर मदन मोहन बजाज, इब्राहिम और विजयराज सिंह BIS सिद्धांत (Bajaj-Ibrahim-Singh) कहा जाता है । उन्होंने अपनी पुस्तक में बताया है की कैसे दुनियाभर में फैले कत्लखानों की वजह से भूकम्प आते हैं क्योंकि जब किसी जीव की हत्या होती है तो उसकी तड़प और चीत्कार से प्रकृति में कुछ तरंगों का निर्माण होता है जो भूकम्प और सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदा का बड़ा कारण है ।