Goga Navami – वीर गोगाजी या गोगा नवमी के बारे में जाने

Goga-Navami

Goga Navami

Goga Navami-गोगा देव राजस्थान के लोक देवता माने जाते हैं। इन्हें जाहरवीर गोग राणा के नाम से भी जाना जाता है। इनके जन्म को लेकर कथा प्रचलित है जिसका वर्णन हम यहां कर रहे हैं। राजस्थान के महापुरुष गोगाजी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इसे गोगा नवमी के नाम से जाना जाता है।

सिद्ध वीर गोगा देव गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। गोगा देव का जन्म स्थान राजस्थान के चुरू जिले के दत्तखेड़ा में स्थित है। जहां पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

Goga Navami- नाथ परम्परा के साधुओं के लिए यह स्थान बहुत महत्व रखता है। दूसरी ओर कायम खानी मुस्लिम समाज उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्‍था टेकने और मन्नत मांगने आते हैं। इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की श्रद्धा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए।

Goga Navami- वीर गोगाजी का इतिहास

गोगाजी चौहान राजस्थान के लोक देवता हैं जिन्हे जाहर वीर के नाम से भी जाना जाता है। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का एक शहर गोगामेड़ी है। यहां भादों कृष्णपक्ष की नवमी को गोगाजी देवता का मेला भरता है। इन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनो पूजते हैं। गुजरात मे रेबारी जाती के लोग गोगाजी को गोगा महाराज केे नाम सेे बुलाते है।

गुरुगोरखनाथ के परमशिष्य थे। उनका जन्म विक्रम संवत 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गाँव में हुआ था। सिद्ध वीर गोगादेव के जन्मस्थान राजस्थान के चुरू जिले के दत्तखेड़ा ददरेवा में स्थित है जहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं। कायम खानी मुस्लिम समाज उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्‍था टेकने और मन्नत माँगने आते हैं।

इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है। मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के राजपूत शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था।

Goga Navami

राजस्थान की भूमि वीरों और संत देवताओं की देवभूमि हैं। यहाँ के मुख्य लोक देवताओं में पाबूजी, हरबुजी, रामदेवजी, तेजाजी और जाहरवीर गोगाजी का नाम आता हैं। गोगाजी जिन्हें सांपो का देवता भी कहते हैं।

गोगादे चौहान ददरेवा चुरू के निवासी थे। इनके पिता का नाम जेंह्वर तथा माता का नाम बाइल था। बाइल गोरखनाथ की भक्त थी। बाइल की सेवा से प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने गूगल धूप से बना सर्प दिया और कहा कि इसे दूध में घोल कर पी जाना, परिणामस्वरूप गोगादे (गोगाजी) का जन्म हुआ। लोकदेवता गोगाजी का विवाह पाबूजी के बड़े भाई बुडौजी की पुत्री केमलदे से करना चाहते थे, लेकिन बूडोजी यह नही चाहते थे।

एक दिन गोगाजी ने सर्प का रूप धारण कर फूलों के बिच बैठ गये। केमलदे फूल लेने लगी, तब सांप से उसे डस लिया। अंत में गोगाजी के अभिमंत्रित धागे से केमलदे के बाँधने से वह ठीक हो गई और दोनों का विवाह हो गया।

गोगाजी ने दिल्ली के सुलतान फिरोजशाह से युद्ध किया। इस युद्ध में गोगाजी के दो मौसेरे भाई अरजन व सरजन भी बादशाह की ओर से लड़ रहे थे। वे दोनों मारे गये। अपने घर पर यह बात गोगा ने अपनी माता को बताई, वह बहुत नाराज हुई और गोगा को घर से चले जाने और मुहं नही दिखाने को कहा। गोगाजी को यह बहुत बुरा लगा और जीवित समाधि ले ली।

भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी को गोगा नवमी के रूप में मनाया जाता है। तथा लोकदेवता के रूप में गोगाजी की पूजा होती है। नौ गाठ वाली गोगा राखी हल चलाते समय हल व हाली दोनों के बाँधी जाती है। ददरेवा राजगढ़ चुरू रतनगढ़ आदि क्षेत्रों में गोगाजी के मेले लगते है। लोकदेवता गोगाजी के थान को गोगामेड़ी कहा जाता है।

जो इंद्रमानगढ़ किले में स्थित है। गोगाजी के भक्त हाथों में ऊँचे निशान लिए हुए ढोल नगाड़े, झांझर आदि बजाते हुए नृत्य करते है। रात्रि जागरण भी किया जाता है गोगामेड़ी के मेले में राजस्थान से बाहर के लोग भी आते है।

मान्यता है कि गोगाजी की मां बाछल देवी को संतान नहीं हुई थी वो निःसंतान थीं। संतान प्राप्त के लिए बाछल देवी ने हर तरह के यत्न कर लिए थे। लेकिन उन्हें किसी भी तरह से संतान सुख नहीं मिला। गुरु गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या में लीन थे। तभी बाछल देवी उनकी शरण में पहुंच गईं। उन्होंने उन्हें अपनी सभी परेशानी बताईं।

तभी गुरु गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। गोरखनाथ ने बाछल देवी को प्रसाद के तौर पर एक गुगल नामक दिया। यह प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई। इसके बाद गोगा देव (जाहरवीर) का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से ही इनका नाम गोगाजी पड़ गया।

वैसे तो हर रोज गोगाजी मंदिर में बड़ी संख्या में भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन भाद्र मास (अगस्त-सितंबर) के 9 वें दिन लोग गोगाजी श्रद्धांजलि देने के लिए यहां आते हैं। मंदिर में रिवाज के रूप में डीअर पर काला सांप बनाया जाता है और गोगाजी को प्रसन्न करने के लिए मीठे व्यंजन बनाए जाते हैं और उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। मंदिर में प्रसाद के रूप में चूरमा भी शामिल है। गोगाजी के सम्मान में हर साल एक विशाल मेला आयोजित किया जाता है जिसमें भारी संख्या में भक्त शामिल होते हैं।

यह मेला मंदिर समिति द्वारा आयोजित किया जाता है जो 9 वें दिन शुरू होता है 11 वें दिन तक यानि 3 दिनों तक चलता है। मेले में राजस्थान के भोजन और स्थानीय कलाकृतियों को बेचने वाले कई प्रकार के स्टॉल लगते हैं। यहां पर लोग गोगाजी के भजन गाते और ढोल बजाकर नाचते हैं। इस मेले के दौरान लोग गोगाजी के जन्म स्थान पर जश्न मानते हैं और अपने गले में सांप डालते हुए नाचते हैं।