एक बार की बात है, एक छोटा-सा प्यारा गाँव था। गाँव के चारों तरफ हरे-भरे खेत, बड़े-बड़े पेड़ और दूर तक फैली छोटी पहाड़ियाँ थीं। गाँव के पास से एक साफ पानी की नदी बहती थी। गर्मियों में नदी शांत रहती थी, लेकिन बारिश के मौसम में उसका पानी तेज बहने लगता था।
नदी को पार करने के लिए लकड़ियों का एक छोटा-सा पुल बना हुआ था। पुल काफी संकरा था, इसलिए उस पर एक समय में एक ही जानवर आसानी से निकल सकता था। गाँव के लोग इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे और पुल पार करते समय हमेशा सावधानी रखते थे।
उसी गाँव में दो बकरियाँ रहती थीं। एक सफेद बकरी थी, जिसका नाम गौरी था। वह स्वभाव से शांत और समझदार थी। दूसरी बकरी का नाम चंपा था। चंपा दिल की बुरी नहीं थी, लेकिन उसकी एक आदत खराब थी—वह अपनी बात को लेकर जल्दी जिद पर अड़ जाती थी और गुस्सा भी बहुत जल्दी हो जाती थी।
एक सुबह दोनों बकरियाँ खाना ढूँढ़ने के लिए घर से निकल पड़ीं। गौरी नदी पार करके दूसरी तरफ के हरे मैदान में चली गई, जहाँ मुलायम और ताजी घास खूब उगी हुई थी। वहीं चंपा जंगल के किनारे चली गई। वहाँ भी उसे खाने के लिए काफी घास मिल गई।
दोनों पूरे दिन आराम से घास चरती रहीं। उन्हें समय का पता ही नहीं चला। शाम होने से कुछ पहले अचानक मौसम बदल गया। आसमान पर काले बादल छाने लगे और तेज हवा चलने लगी।
गौरी ने आसमान की तरफ देखते हुए सोचा, “लगता है बारिश आने वाली है। मुझे जल्दी घर निकल जाना चाहिए।”
वह तुरंत नदी के पुल की ओर चल पड़ी। उधर चंपा भी जंगल से लौट रही थी और संयोग से वह भी उसी पुल पर पहुँच गई।
दोनों अपनी-अपनी तरफ से पुल पर चढ़ीं और धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहीं। कुछ ही पल बाद दोनों पुल के बीचों-बीच आमने-सामने खड़ी थीं।
गौरी ने रुककर कहा, “चंपा, पुल बहुत संकरा है। तुम थोड़ा पीछे हो जाओ, मैं पहले निकल जाती हूँ। फिर तुम आराम से घर चली जाना।”
चंपा ने तुरंत जवाब दिया, “मैं ही क्यों पीछे हटूँ? तुम पीछे चली जाओ।”
गौरी ने शांत आवाज में कहा, “देखो, अगर हम दोनों जिद करेंगी तो न तुम आगे जा पाओगी, न मैं। थोड़ा इंतजार करने से दोनों का काम हो जाएगा।”
लेकिन चंपा का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। उसने कहा, “मुझे भी घर जाना है। मैं तुम्हारे लिए क्यों रुकूँ?”
गौरी ने उसे समझाने की कोशिश की, “किसी एक का थोड़ा पीछे हट जाना कोई हार नहीं है। हमें पहले सुरक्षित घर पहुँचना चाहिए।”
चंपा ने उसकी बात नहीं मानी। दोनों वहीं खड़ी होकर बहस करने लगीं। बात इतनी बढ़ गई कि चंपा ने गुस्से में गौरी को सींग से हल्का धक्का दे दिया। गौरी का संतुलन बिगड़ा, तो उसने खुद को संभालने के लिए चंपा को पीछे कर दिया।
पुल पुराना और कमजोर था। दोनों के धक्का-मुक्की करने से वह जोर-जोर से हिलने लगा। नीचे नदी का पानी भी तेज बह रहा था।
गौरी घबराकर बोली, “चंपा, बस करो! पुल हिल रहा है। हम दोनों मुसीबत में पड़ जाएँगी।”
लेकिन चंपा अभी भी गुस्से में थी। उसने आगे बढ़ने की कोशिश की, तभी उसका पैर फिसल गया और वह सीधे नदी में जा गिरी।
गौरी ने उसे गिरते देखा तो घबरा गई। उसी समय उसका भी संतुलन बिगड़ा और वह नदी में जा गिरी।
तेज पानी में दोनों बहुत डर गईं। गौरी ने हिम्मत नहीं छोड़ी। तैरते हुए वह नदी के किनारे पड़े एक बड़े पत्थर तक पहुँची और उसे पकड़ लिया। चंपा को पास ही पेड़ की एक मजबूत टहनी मिल गई, जिसे उसने कसकर पकड़ लिया।
कुछ देर बाद जब दोनों ने एक-दूसरे को देखा तो उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि डर और पछतावा था।
चंपा ने धीरे से कहा, “गौरी, मुझे माफ कर दो। मेरी जिद की वजह से हम दोनों मुसीबत में फँस गईं।”
गौरी ने भी कहा, “मुझे भी तुमसे बहस नहीं करनी चाहिए थी। अगर हम दोनों में से कोई एक थोड़ा समझौता कर लेती, तो आज यह हालत नहीं होती।”
दोनों ने हिम्मत जुटाई और धीरे-धीरे नदी के किनारे की तरफ बढ़ने लगीं। जब चंपा थक जाती तो गौरी उसे हौसला देती। और जब गौरी को रास्ते में परेशानी होती, तो चंपा उसकी मदद करती। काफी कोशिश के बाद आखिरकार दोनों सुरक्षित किनारे पर पहुँच गईं।
उस दिन दोनों को अपनी गलती अच्छी तरह समझ आ गई। उन्होंने तय किया कि आगे से किसी छोटी-सी बात को लेकर जिद नहीं करेंगी और मुश्किल समय में एक-दूसरे की मदद करेंगी।
उस दिन के बाद जब भी दोनों उस पुल पर पहुँचतीं, एक-दूसरे को पहले रास्ता देतीं। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती भी पहले से ज्यादा मजबूत हो गई।
सीख:
जिद और गुस्सा अक्सर समस्या को और बड़ा बना देते हैं। समझदारी, धैर्य और थोड़ा-सा समझौता हमें बड़ी मुसीबत से बचा सकता है। हर बार अपनी बात मनवाना जरूरी नहीं होता; कभी-कभी दूसरे को रास्ता देना ही असली समझदारी होती है।





























